Sunday, April 9, 2017

शिक्षक दंपती की मेहनत : सालभर पहले बंद होने वाला था स्कूल, अब 3 गुना बढ़ गए छात्र

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जींद (हरियाणा). जींद जिले के जीतगढ़ गांव का राजकीय प्राइमरी स्कूल छात्रों की संख्या 35 होने के कारण एक साल पहले बंद होने को था। पिछले साल जींद शहर में रहने वाले जेबीटी टीचर दंपती रविंद्र व सरोज बाला ट्रांसफर होकर पहुंचे। दंपती ने मेहनत कर स्कूल की सूरत बदल दी।

महज एक साल में छात्रों की संख्या 103 करीब पहुंच गई।
इस स्कूल में अब 10 किमी दूर जींद शहर व आसपास के दो गांवों से करीब 50 बच्चे निजी स्कूल छोड़ यहां पढ़ने आते हैं। स्कूल आने-जाने में दिक्कत न हो। इसके लिए टीचर दंपती ने निशुल्क वैन लगाई है, जिसपर 8-10 हजार रुपए दंपती अपनी सेलरी से खर्च करती है। गांव की महिला सरपंच बबली ने इनकी मेहनत देखकर अपना इकलौता बेटा शहर के निजी स्कूल से हटाकर यहीं दाखिला करवा दिया। कई ग्रामीणों ने भी सरकारी स्कूल में दाखिल कराया है। स्कूल में स्वीपर नहीं है, दंपती शिक्षक सुबह आकर सबसे पहले सफाई करते हैं। वर्ष 2017 में ब्लॉक लेवल पर स्कूल को सौंदर्यीकरण में पहला पुरस्कार हासिल हुआ। अपने खर्चे से कंपयूटर शिक्षा से लेकर खेलने तक की सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं। रविंद्र कुमार बताते हैं कि ये सब मेहनत वे सरकारी स्कूलों के गिरते स्तर को ऊंचा उठाने के लिए कर रहे हैं। निजी स्कूल अब दुकान बनकर रह गए हैं।
साइंस संकाय की मांगी मंजूरी, स्मार्ट क्लास, मोबाइल प्रोजेक्टर लगाए
गांव सुताना में राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में केवल आर्ट संकाय में पढ़ाई होती है। पंचायत ने विभाग को पत्र भेजा कि उन्हें स्कूल में मेडिकल-नाॅन मेडिकल कोर्स शुरू करने हैं। इसी सत्र से मंजूरी दी जाए। विभाग ने जिला अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है। इससे 5 गांवों के बच्चों को फायदा मिलेगा।

इधर, गांव झट्टीपुर में दो राजकीय स्कूल हैं, एक में अंग्रेजी के अध्यापक की कमी थी। सरपंच ने अपनी पत्नी को स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए भेजना शुरू कर दिया। वहीं अध्यापक न होने पर बच्चे खाली न बैठें इसके लिए स्मार्ट क्लास रूम बनवा दिए। ऐसे ही गांव सिवाह में पंचायत ने अंग्रेजी की शिक्षा के लिए तीन टीचरों को अपने खर्च पर लगाया है।
इसराना के राजकीय स्कूल में कला अध्यापक प्रदीप मलिक ने अपने खर्च से स्कूल में कला लैब बना दी है, जो बच्चे संसाधन नहीं खरीद सकते, उन्हें स्कूल समय के बाद यहां कला सीख सकते हैं। इसमें प्रदर्शनी लगाई हुई हैं। स्कूल के पास स्मार्ट क्लास रूम बनाने के लिए खर्च नहीं था तो ये अपनी सेलरी से मोबाइल प्रोजेक्टर ले आए, जिस पर बच्चों को स्मार्ट क्लास रूम की तरह पढ़ाते हैं।

Posted by HEDO

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